महान आयुर्वेदिक लूट ! - 7

 सातवाँ भाग: ज़ख्म जो उल्टा भरता है

बीमारियाँ जिस क्रम में आती हैं, वे उसी के उल्टे क्रम में ठीक होती हैं। इसे हेरिंग का नियम कहते हैंहालाँकि नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता। बात सिर्फ इतनी है कि जो पहले आया, वह अंत में जाएगा। जो बाद में आया, वह पहले जाएगा।

मरीज़ शून्य ने यह अपने ऊपर देखा है।

पहले आया चक्करसालों तक बिस्तर पर पटके रखा। अब वह आता ही नहीं।

फिर आई एसिडिटीरात दो बजे जगाने वाली। अब कम आती है, कम जलन वाली।

फिर आया त्वचा का धब्बा – 1991 में, बचपन में। वह अब भी है, पर छोटा है, कम गरम है, कम जिद्दी है।

फिर आया दर्दवात का झूला। अब भी है, पर झूला छोटा हो गया है।

फिर आई पेशाब की जलनपित्तपापड़ा से। अब सिर्फ तब होती है जब वह कोई गलती करता है।

वह ठीक नहीं हुआ। पर वह भर रहा हैउल्टा, अंदर से, सिर से पाँव की तरफ, बचपन से अब तक।

यह धीमी, बदसूरत, दिखने में बेकार प्रक्रिया है। सिस्टम इसे माप नहीं सकता। सिस्टम के यंत्र केवल मरे हुए को माप सकते हैंवे जो लकीर खींच देते हैं, "सामान्य" कहते हैं, और मरीज़ को घर भेज देते हैं।

पर मरीज़ शून्य अब सिस्टम के यंत्रों पर नहीं जाता। वह अपने लॉग पर जाता है। उसका अपना आँकड़ा है, उसका अपना नियम है, उसका अपना समय है।

वह उल्टा भर रहा है। उल्टा ही सहीपर भर रहा है।

(यह लेख किसी खास व्यक्ति, संस्था या उत्पाद का नाम नहीं लेता। यह एक मरीज़ का दृष्टिकोण हैनिदान या उपचार सलाह नहीं।)

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“Simple things in life are rare. Cherish them always”.

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