वह शिक्षक जिसका फोन शुक्रवार की रात को बजा
— एक शिक्षक की कहानी, जो हर विद्यालय की कहानी है एक शुक्रवार की रात थी। सप्ताह के पाँच दिन किसी तरह पूरे हुए थे — पाठ योजनाएँ, उपस्थिति पंजिका, अचानक आई निरीक्षण टीम, मध्याह्न भोजन की देखरेख, और इन सबके बीच कहीं वह असली काम भी जिसके लिए यह पेशा चुना था — पढ़ाना। वह पढ़ाना जिसमें सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, एक-एक बच्चे की समझ होती है। जो भीतर से ऊर्जा माँगता है, और वह ऊर्जा रात को सोने से पूरी तरह वापस नहीं आती। तभी फोन बजा। दूसरी तरफ एक अभिभावक थे। क्रोधित। उनके बच्चे ने कक्षा की परीक्षा में कम अंक पाए थे। बातचीत का विषय यह नहीं था कि बच्चा कहाँ कमज़ोर है, या घर पर किस प्रकार सहयोग किया जा सकता है। विषय यह था — और वह भी शुक्रवार की रात नौ बजे, बिना किसी हिचकिचाहट के — कि इस शिक्षक ने पूरे सप्ताह किया क्या? जो शिक्षक इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं, उनमें से अधिकांश ने अभी भीतर ही भीतर सिर हिलाया होगा। इसलिए नहीं कि यह कोई विचित्र घटना है। बल्कि इसलिए कि यह हर जगह होती है — अलग-अलग विद्यालयों में, अलग-अलग नामों के साथ — लेकिन एक ही अटल धारणा के साथ: बच्चे के परिणाम की पूरी जिम्मेद...